धरती आबा के जयकारों से गूँजे गाँव : सहरिया क्रांति ने भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती भव्यता से मनाई

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 घर-घर पूजन अभियान, माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ आदिवासी स्वाभिमान का उत्सव

वक्ताओं ने संगठन, संघर्ष और विकास का दिया संदेश


शिवपुरी। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर मंगलवार को सहरिया समाज में उत्साह, गर्व और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिला। सहरिया क्रांति संगठन ने इस ऐतिहासिक अवसर को जिलेभर में धूमधाम से मनाया। गांव-गांव में घर-घर पूजन कर भगवान बिरसा मुंडा को तिलक लगाया गया और उनके साहस, संघर्ष और बलिदान को नमन किया गया। मुख्य आयोजन ग्राम सुरवाया में हुआ, जहाँ बड़ी संख्या में आदिवासी भाई-बहन इस प्रेरक दिवस में शामिल होने पहुंचे। कार्यक्रम की शुरुआत भगवान बिरसा मुंडा के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुई।

कार्यक्रम में सहरिया क्रांति के संयोजक संजय बेचैन ने अपने प्रभावशाली वक्तव्य में कहा 

बिरसा मुंडा केवल एक नाम नहीं, आदिवासी अस्मिता की प्रेरणा हैं। उन्होंने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और गांधीजी से बहुत पहले अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह प्रारंभ किया। जब स्वतंत्रता आंदोलन संगठित रूप में प्रारंभ भी नहीं हुआ था, तब उन्होंने झारखंड के जंगलों और ऊंची घाटियों में स्वराज का शंखनाद किया। ‘अबुआ राज एते जाना, महारानी राज ट्रेडू जाना’—यह नारा केवल शब्द नहीं था, बल्कि एक क्रांतिकारी विचार था जिसने हजारों आदिवासियों में चेतना जगाई। आज हमें उनके मार्ग पर चलकर समाज के अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प लेना चाहिए।

इसके बाद प्रदेशाध्यक्ष औतार भाई सहरिया ने भावुक होते हुए कहा धरती आबा बिरसा मुंडा हमारे पूर्वजों की वह अमर धरोहर हैं, जिन्होंने हमें सिर उठाकर जीना सिखाया। उनका जीवन हमें बताता है कि संगठित समाज सबसे मजबूत होता है। आज जब हम उनकी जयंती मना रहे हैं तो हमें प्रण लेना चाहिए कि हम समाज को विविध संघर्षों से निकालकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की दिशा में ले जाएँगे।

सभा को संबोधित करते हुए जिला अध्यक्ष अजय आदिवासी ने कहा बिरसा मुंडा ने जंगल-जमीन और आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ी। उन्होंने दिखाया कि अत्याचारी शासन कितना भी मजबूत क्यों न हो, संगठित जनता उससे बड़ी होती है। आज आदिवासी समाज को शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से मजबूत करने की जरूरत है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से कह सकें कि वे धरती आबा के वंशज हैं।"

कल्याण क्रांति ने कहा धरती आबा का जीवन एक संघर्ष गाथा है। उन्होंने साबित किया कि कठिन परिस्थितियाँ भी हिम्मत और संगठन के आगे टिक नहीं सकतीं। हम सबको उनके आदर्शों को जीवन में अपनाना चाहिए, ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँच सके।"

ग्राम पंचायत सुरवाया के सरपंच दिलीप आदिवासी ने अपने सरल लेकिन प्रभावी शब्दों में कहा 

बिरसा मुंडा की गूँज आज भी जंगलों की हवा में सुनाई देती है। उनकी विचारधारा को नई पीढ़ी तक पहुँचाना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। यदि हम उनके मार्ग पर चलें, तो हमारा समाज एकजुट होकर हर चुनौती का सामना कर सकता है।

कार्यक्रम में राजेश सोनीपुरा ने भी अपने उद्बोधन में कहा बिरसा मुंडा वह क्रांतिकारी प्रकाश-पुंज थे जिन्होंने आदिवासी समाज को अंधकार से बाहर निकालकर आत्मसम्मान की राह दिखाई। वे केवल झारखंड के नहीं, पूरे राष्ट्र के जननायक हैं। आज उनकी जयंती हमें नया साहस और नई चेतना प्रदान करती है।

सभा के अंत में उपस्थित जनसमूह ने संकल्प लिया कि वे भगवान बिरसा मुंडा के बताए मार्ग पर चलते हुए समाज के अधिकारों और सम्मान के लिए सदैव एकजुट रहेंगे। कार्यक्रम का समापन आदिवासी नृत्य, गीत और धरती आबा अमर रहें के जयघोष के साथ हुआ जिसने पूरे वातावरण को ऊर्जा और गौरव से भर दिया।

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