नए साल में मंगलमय नजर आते हैं भारतीय शेयर बाजार

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- बाजार की उतार-चढ़ावों के बीच शिवपुरी के आर्थिक विश्लेषक दुर्गेश गौड़ की कलम से



शिवपुरी जिले के रहने वाले आर्थिक विश्लेषक दुर्गेश गौड़ का मानना है कि शेयर बाजारों को अक्सर अर्थव्यवस्था का आईना माना जाता है। जहां अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता बाजारों को प्रोत्साहित करती है, वहीं आर्थिक गिरावट उनमें कमजोरी की भावना पैदा करती है। हाल ही में गुजरा 2025 भारतीय बाजारों के लिए कमजोरी का साल रहा। 2025 में भारतीय शेयर बाजार उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले बाजार साबित हुए। उभरती अर्थव्यवस्थाओं में एमएससीआई इंडिया इंडेक्स ने महज 1.9% का रिटर्न दिया वहीं एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स का रिटर्न 9% से अधिक रहा। गत 6 वर्षों में भारतीय बाजारों ने पहली बार अन्य मुख्य उभरती अर्थव्यवस्थाओ की तुलना में निम्नतम रिटर्न दिया। जिसकी वजहों में भारतीय बाजारों का अधिक मूल्यांकन, टैरिफ वार से जुड़ी अनिश्चितताऐं, घटती वैश्विक मांग, विदेशी निवेशकों की एकतरफा बिकवाली आदि रहे। यहां गौरतलब है कि विगत 2025 में एफपीआई ने भारतीय बाजारों से 1.66 लाख करोड़ रुपए की निकासी की। प्रथम दृष्टता अधिमूल्यांकन समेत बाजारों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाले बांकी घटक, जिनकी चर्चा हमने ऊपर की, आगे भी बने रह सकते हैं। परन्तु यहां कुछ और भी महत्वपूर्ण घटक हैं। जो बाजारों में उम्मीदों का संचार करते हैं।


मूल्यांकन के लिहाज से भारतीय शेयर बाजार 22 के पीई गुणक के साथ अन्य उभरते बाजारों में महंगे नजर आते हैं। लेकिन जब हम मूल्यांकन को प्रभावित करने वाले दूसरे बिंदु जैसे जीडीपी टू मार्केट कैपिटलाइजेशन के लिहाज से देखते हैं। तो 135% के साथ भारतीय बाजार अपने लॉन्ग टर्म एवरेज के आस पास नजर आते है। चालू वर्ष व आगामी वर्ष के 7% से अधिक के जीडीपी अनुमान के अनुसार यह रेशो गिरकर 125% के करीब हो जाता है। वहीं नॉमिनल जीडीपी जो कॉरपोरेट आय का मुख्य आधार है। उपभोक्ता महंगाई के आधा प्रतिशत रहने से 8% के आस पास है। जिसके नवीन वर्ष में 1 से 2 प्रतिशत तक बढ़नें की उम्मीद है। इस लिहाज से नॉमिनल जीडीपी टु मार्केट कैप रेशो और भी कम होना स्वाभाविक है। जो बाजारों के बड़े हुए मूल्यांकन को रिजनेबल बनाता है। इसी क्रम में बॉन्ड टू इक्विटी अर्निंग यील्ड, वह पैमाना जिसपर बॉन्ड यील्ड और शेयर बाजारों के रिटर्न की तुलना की जाती है, दर्शाता है कि गत वर्ष में भारत समेत दुनियाभर की मुख्य अर्थव्यवस्थाओं की बॉन्ड यील्ड में गिरावट आई है। जो शेयर बाजारों के परिदृश्य को बॉन्ड रिटर्न के सामने आकर्षक बनाता है।


अमेरिकी फेडरल बैंक द्वारा व्याज दरों में की जा रही कमी डॉलर को सस्ता बनाती है, जो भारतीय पूंजी बाजारों के लिए अपने आप में अच्छी खबर है। गत वर्ष रुपए की कीमत में आई बढ़ी गिरावट डॉलर के सामने भारतीय बाजारों को सस्ता बनाती है। साथ ही आरबीआई द्वारा रेपो दर में 1.25% कटौती की गई है। जिसके चलते सस्ती नगदी का संचार अर्थव्यवस्था में तेजी का वाहक बन सकेगा। महंगाई की अपेक्षा भी आगामी वर्ष के लिए नीची बनी हुई है, जो कम व्याज दरों के साथ उच्च विकास चक्र के लिए अनुकूल माहौल बनाती है। सरकार का फ़िसकल गणित भी बाजार फ्रैंडली बना हुआ है। एक ओर जहां जीएसटी दरों में कटौती कुल खपत एवं कॉरपोरेट आय पर सकारात्मक प्रभाव बनाते हुए अर्थव्यवस्था को गति देते है। वहीं दूसरी ओर सरकार राजकोषीय घाटे को भी लक्ष्य अनुरूप हासिल करने में आशान्वित नजर आती है।


मैक्रो आर्थिक माहौल का जायजा लेने पर समझ आता है कि लगभग सभी बृहद सूचकांक शेयर बाजारों में तेजी का समर्थन करते हैं। भले ही प्राइस टू अर्निंग (पीई रेशो) पर बाजारों का मूल्यांकन कुछ अधिक है। तब भी अन्य मानकों पर बेहतर दिख रहे भारतीय बाजार पूंजी पर रिटर्न के लिए सस्ते नजर आते हैं। व वर्ष 2026 में तेजी की अपेक्षा पैदा करते हैं।

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