पट्टों के बावजूद उजड़ते आदिवासी, कड़ाके की ठंड में कलेक्टर कार्यालय पर डेरा

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 ट्रांसपोर्ट नगर के नाम पर अवैध तरीके से बेदखली का आरोप, जनमन आवास की दूसरी किश्त रोकने से अधूरे पड़े सपने, न्याय की गुहार लेकर सहरिया परिवार सड़कों पर


*पट्टाधारी आदिवासियों का दर्द सड़कों पर

*वर्षों पुरानी बसाहट उजाड़ने का आरोप, अधूरे पड़े आवासों में तड़पता जीवन

शिवपुरी।

सीर बांसखेड़ी के सहरिया आदिवासी परिवारों का सब्र शुक्रवार को जवाब दे गया। अपनी वर्षों पुरानी समस्या के निराकरण की आस में शिवपुरी जिला मुख्यालय पहुंचे ये आदिवासी जब बार-बार की जनसुनवाई, आवेदन और गुहारों के बाद भी अनसुने रह गए, तो आज कड़ाके की ठंड में ही सहरिया क्रांति की तख्तियाँ हाथों मे लेकर कलेक्टर कार्यालय पर डेरा डालकर बैठ गए। खुले आसमान के नीचे बैठे इन गरीब  परिवारों की आंखों में आक्रोश था, आवाज़ में पीड़ा और सवालों में प्रशासन के लिए तीखा कटघरा।

आदिवासी गोपाल का कहना है कि उनके पास वर्षों से भूमि के वैध पट्टे हैं, इसके बावजूद उन्हें ट्रांसपोर्ट नगर के कथित निर्माण के नाम पर अवैध रूप से बेदखल किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि कई बार जनसुनवाई में आवेदन दिए, कलेक्ट्रेट के चक्कर काटे, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं। अब हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि उनके आशियाने छिनने की नौबत आ गई है।

सहरिया आदिवासी समुदाय के ये परिवार बेहद गरीब, भूमिहीन और साधनहीन हैं। करीब 50-60 वर्षों से शील बांसखेड़ी   बजरंग कॉलोनी क्षेत्र में -झोपड़ियों व पटोर बनाकर उसमे  रहकर मजदूरी जैसे अस्थायी कामों से जीवन यापन कर रहे हैं। इन्हीं परिवारों को प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना ने पहली बार पक्की छत का सपना दिखाया। सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ आवेदन किए गए, सर्वे हुआ, भू-अवलोकन हुआ और कई परिवारों के आवास स्वीकृत भी हो गए। पहली किश्त की राशि खातों में आई, जिससे नींव खुदाई और पिलर निर्माण तक कार्य हो गया।

लेकिन इसके बाद कहानी ने दर्दनाक मोड़ ले लिया। पहली किश्त के बाद दूसरी किश्त अचानक रोक दी गई। वजह बताई गई कि जिस भूमि पर निर्माण हो रहा है, वह ट्रांसपोर्ट नगर के लिए आरक्षित है। आदिवासी परिवार सवाल कर रहे हैं कि यदि भूमि वास्तव में आरक्षित थी, तो ऑनलाइन सर्वे कैसे हुआ, पहली किश्त किस आधार पर स्वीकृत की गई और निर्माण शुरू क्यों कराया गया?

अब निर्माण अधूरा है, दीवारें खड़ी हैं लेकिन छत नहीं। सर्द रातों में आधे बने मकानों और झुग्गियों में बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं का जीवन खतरे में है। बारिश में टपकती छतें, सर्दी में ठिठुरता शरीर और गर्मी में तपता फर्श इन परिवारों की नियति बन गई है। इससे भी ज्यादा पीड़ा इस बात की है कि जिन जमीनों पर इनके खेती  के पट्टे हैं, वहां पर भी निर्माण कार्य कराया जा रहा है और इन्हें हटाने की तैयारी चल रही है।जबकि 2006 से पहले जमीन पर बसे आदिवासियों को वनधिकार के पट्टों की पात्रता भी है , तो राजस्व भूमि से उन्हे क्यों उजाड़ा जा रहा है । 

आदिवासियों ने साफ कहा कि उनके पास कोई वैकल्पिक भूमि नहीं है। पीढ़ियों से वे इसी जगह रह रहे हैं। यह केवल जमीन का नहीं, बल्कि अस्तित्व और सम्मान का सवाल है। अधूरे आवासों के कारण उनका श्रम, समय और सीमित संसाधन सब बर्बाद हो रहा है।

डेरा डाले बैठे आदिवासियों ने मांग की कि उनके पट्टों की जमीन पर किसी भी तरह का निर्माण तत्काल रोका जाए, प्रधानमंत्री जनमन आवास की रोकी गई दूसरी किश्त तुरंत जारी की जाए और उन्हें उनके घर पूरे करने दिया जाए। सहरिया क्रांति के राष्ट्रीय संयोजक सनजी बेचैन का कहना है कि आदिवासियों को बेदखल उनकी बर्षों पुरानी भूमि से बेदखल करना मानवअधिकारों का उल्लंधन है । हमे प्रदेश व्यापी आंदोलन को विवश होना पड़ेगा । 

कड़ाके की ठंड में कलेक्टर कार्यालय के बाहर बैठे ये परिवार सिर्फ छत नहीं मांग रहे, बल्कि अपने हक, भरोसे और उस व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं, जिसने पहले सपना दिखाया और अब उसे अधूरा छोड़ दिया। अब देखना यह है कि प्रशासन इन सिहरती आवाज़ों को सुनेगा या यह डेरा किसी और बड़े संघर्ष की शुरुआत बनेगा।

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