मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:नियम बनाकर उनसे पीछे हटने से क्या संदेश जाता है? Breaking News Update

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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:नियम बनाकर उनसे पीछे हटने से क्या संदेश जाता है? Breaking News Update

इंडिगो की सैकड़ों उड़ानें रद्द होने से देश के हवाई अड्डों पर जो अराजकता पैदा हुई है, उसने मुख्यतया दो सवाल खड़े किए हैं।

पहला, क्या डीजीसीए ने पायलटों और चालक दल पर नए नियम लागू करने में जरूरत से ज्यादा सख्ती दिखाई थी? दूसरा, क्या इन नियमों के पालन में लापरवाही के लिए इंडिगो जिम्मेदार है? डीजीसीए को अपने नए दिशानिर्देश अस्थायी रूप से वापस लेने पड़े हैं।

उन दिशानिर्देशों के अनुरूप पायलटों और चालक दल के रोस्टर की तैयारी के लिए इंडिगो के पास 20 महीने का समय था।

पायलट-प्रति-विमान अनुपात के मामले में इंडिगो- एअर इंडिया और अन्य भारतीय एयरलाइनों की तुलना में सबसे नीचे है।

वास्तव में पायलटों की कम संख्या इंडिगो की लागत घटाने की रणनीति का हिस्सा है।

इसी ने उसे दुनिया की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली एयरलाइनों में शामिल किया है।

2024-25 में उसने 7,258 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ दर्ज किया था और उसकी मार्केट-कैप 2.08 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गई थी।

एयर डेक्कन के जीआर गोपीनाथ ने एक लेख में कहा है कि डीजीसीए के नियम तय करते हैं, पायलट और केबिन-क्रू अधिकतम कितने घंटे काम, उड़ान व ड्यूटी पर रह सकते हैं।

नियम कह सकते हैं कि कोई पायलट एक वर्ष में 900 घंटे की उड़ान भर सकता है, लेकिन 28 दिनों में 100 घंटे से अधिक नहीं।

या दो पायलटों के साथ 8 घंटे से अधिक उड़ान नहीं।

जबकि 3-4 पायलटों के साथ एक दिन में 13-16 घंटे तक की ऐसी उड़ानें संभव हैं, जिनमें 5-6 से अधिक स्टॉपओवर और रात में अधिक लैंडिंग शामिल न हों।

लेकिन डीजीसीए-इंडिगो विवाद दिखाता है कि कैसे रेगुलेटरी अथॉरिटी व्यापारिक दक्षता बढ़ाने के मूल उद्देश्य को ही बाधित कर देते हैं।

हाल में केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व वाले दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने मोबाइल फोन निर्माता कंपनियों के लिए संचार साथी एप को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने का निर्देश जारी किया था।

इसका उद्देश्य साइबर धोखाधड़ी रोकना था, लेकिन एक्टिविस्टों का कहना था कि इससे डेटा चोरी बढ़ सकती है।

परिणामस्वरूप, इंडिगो मामले की तरह सरकार को इसमें भी नियम में संशोधन करना पड़ा और संचार साथी एप की प्री-इंस्टॉलेशन को स्वैच्छिक कर दिया गया।

अपने फैसलों से इस तरह लगातार पीछे हटने से संकेत मिलता है कि नियामक संस्थाएं नौकरशाही के नियंत्रण में फंस चुकी हैं।

प्रक्रियाओं को सरल बनाने के बजाय नए नियम अकसर उनके अनुपालन को कठिन बना देते हैं, जिससे अधिकारियों को अधिक शक्तियां मिल जाती हैं।

यह ईज ऑफ डुइंग बिजनेस के लक्ष्य के विपरीत है।

कई नए नियम तो बिना संभावित परिणामों का पर्याप्त अध्ययन किए लागू किए प्रतीत होते हैं।

कुछ सप्ताह पहले ही सरकार को क्वॉलिटी कंट्रोल ऑर्डर्स (क्यूसीओ) वापस लेने पड़े थे, जिनसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यावहारिक रूप से दूभर हो गया था।

जरूरत से ज्यादा नियम लादने का मूल कारण यह है कि एआई और ऑटोमेशन के दौर में अधिकारी अपने-अपने डोमेन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं।

तकनीकी बदलावों ने वे रास्ते बंद कर दिए हैं, जिनके माध्यम से अधिकारी अपने विवेकाधिकार का उपयोग करके लाभ उठा सकते थे।

जैसे-जैसे वे मौके समाप्त हो रहे हैं, नौकरशाही नए नियमों के जरिए फिर से कुछ अधिकार प्राप्त करने की कोशिश कर रही है।

अनुपालन को कठिन बनाकर इन अवसरों की खिड़की को थोड़ा-सा खुला रखा जाता है।

मसलन, आधार कार्ड को लेकर हाल ही में किए गए बदलाव में केयर ऑफ विकल्प- जिसमें पिता का नाम दर्ज होता था- हटा दिया गया।

इससे आधार केंद्रों पर भौतिक सत्यापन के लिए लंबी कतारें लग गईं और आरटीओ में भी लोगों को कठिनाई हुई, क्योंकि सभी विवरणों का मेल आवश्यक था।

आमजन के काम को सरल बनाने की जगह ऐसे रेगुलेटरी बदलाव उसे और जटिल कर देते हैं।

इंडिगो-डीजीसीए विवाद ने इस एयरलाइन की साख के साथ-साथ डीजीसीए की निगरानी क्षमता पर भी आघात किया है।

नागरिक उड्डयन नियामक पहले ही एयर इंडिया बोइंग दुर्घटना पर अपनी जल्दबाजी में तैयार रिपोर्ट को लेकर आलोचना का सामना कर रहा है।

उस रिपोर्ट में अमेरिकी विमान निर्माता को लगभग दोषमुक्त दिखाया गया था और दोष पायलट पर मढ़ दिया गया था।

आज डीजीसीए में स्टाफ की भारी कमी है और कार्यभार अत्यधिक है।

प्रभावी नियमन के लिए दोनों समस्याओं का समाधान आवश्यक है, ताकि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और एविएशन की विश्वसनीयता बनी रहे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)।

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Posted on 09 December 2025 | Keep reading सत्यालेख.com for news updates.

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