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उत्तरायण: भीष्म पितामह ने कैसे त्यागे प्राण? धर्म और आध्यात्मिक मार्गदर्शन Makar Sankranti Auspicious Hindu Festival
सत्यालेख की रिपोर्ट के अनुसार, आज मकर संक्रांति के पावन अवसर पर, जिसे उत्तरायण भी कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है।
माना जाता है कि उत्तरायण से देवताओं का दिन प्रारंभ होता है।
द्वापर युग में महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद, भीष्म पितामह ने उत्तरायण के दिन ही अपने प्राण त्यागे थे।
प्राण त्यागने से पूर्व, उन्होंने पांडवों को जीवन में सुख, शांति और सफलता प्राप्त करने के महत्वपूर्ण सूत्र बताए थे।
यह घटना धर्म के महत्व और आध्यात्मिक मार्गदर्शन की आवश्यकता को दर्शाती है।
महाभारत युद्ध में पांडवों की विजय के उपरांत, युधिष्ठिर अपने भाइयों, संबंधियों और गुरुओं के वध से अत्यंत दुखी थे।
हस्तिनापुर का सिंहासन उनका इंतजार कर रहा था, परन्तु उनका मन उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को समझाया कि राजा बनना एक तपस्या है, सम्मान नहीं।
उन्होंने बताया कि राजतिलक के साथ संघर्ष, निर्णय, आलोचना और उत्तरदायित्व भी आते हैं।
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजनीति और धर्म के गूढ़ रहस्य समझाए, जो आज भी प्रासंगिक हैं।
इन उपदेशों में जीवन के मूल्यों, न्याय के मार्ग और धर्म के सिद्धांतों का पालन करने का महत्व बताया गया है।
इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को शुरू करने से पहले अनुभवी व्यक्तियों से सलाह लेना अत्यंत आवश्यक है।
यह घटना हमें धर्म के मार्ग पर चलने और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की प्रेरणा देती है।
- उत्तरायण पर भीष्म पितामह ने त्यागे प्राण, पांडवों को दिया मार्गदर्शन।
- युधिष्ठिर को श्रीकृष्ण ने राजधर्म और तपस्या का महत्व समझाया।
- धर्म और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनुभवी से सलाह लें।
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Posted on 16 January 2026 | Check सत्यालेख.com for more coverage.
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