“परीक्षा नहीं, विश्वास का पतन: जब मेहनत नीलाम होने लगे”

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 जब एक देश अपने युवाओं से कहता है..मेहनत करो, तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है, तो वह केवल एक सलाह नहीं देता बल्कि एक वादा करता है। यही वादा हर उस छात्र की आँखों में बसता है जो रात के सन्नाटे में किताबों के बीच अपना कल तलाश रहा होता है। लेकिन आज वही वादा टूटता हुआ दिखाई दे रहा है और उसके साथ टूट रहा है लाखों युवाओं का विश्वास। नीट 2026 के हालिया घटनाक्रम ने इस सच्चाई को और भी स्पष्ट कर दिया है। लगभग 23 लाख से अधिक छात्र जो इस परीक्षा में शामिल हुए, एक ऐसे संकट के शिकार बने जिसमें कथित रूप से प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही बाजार में पहुँच गया। जांच में सामने आया कि तथाकथित गेस पेपर विषयों के 10 से 25 लाख रूपये तक में बेचा जा रहा था और कई मामलों में 100 से अधिक प्रश्न वास्तविक प्रश्नपत्र से मेल खाते पाए गए। यह केवल एक लापरवाही नहीं बल्कि एक संगठित तंत्र की ओर इशारा करता है। यदि इसे एक अपवाद मान लिया जाए तो शायद स्थिति इतनी भयावह न लगे किंतू तथ्य इससे कहीं अधिक चिंताजनक गंभीर हैं। पिछले 10 वर्षों में देशभर में लगभग 89 पेपर लीक और 48 पुनर्परीक्षाओं के मामले सामने आ चुके हैं, जिनसे करोड़ों अभ्यर्थी प्रभावित हुए हैं। यह आँकड़े बताते हैं कि समस्या अब छिटपुट नहीं रही बल्कि व्यवस्था के भीतर गहराई तक पैठ बना चुकी है। जब एक छात्र परीक्षा कक्ष में बैठता है तो वह केवल प्रश्नों के उत्तर नहीं लिखता, बल्कि अपने जीवन की दिशा तय करता है। लेकिन जब वही प्रश्न पहले से बिक चुके हों, तो उसकी मेहनत का अर्थ क्या रह जाता है? उस क्षण वह केवल प्रतियोगिता नहीं हारता, बल्कि व्यवस्था पर अपना विश्वास भी खो देता है। यह केवल पेपर लीक नहीं है, यह उस भरोसे की हत्या है जिस पर पूरी शिक्षा प्रणाली टिकी हुई है। पूर्व के मामलों में न्यायपालिका द्वारा यह स्वीकार किया जाना कि कुछ छात्रों को सीधे तौर पर ऐसे लीक का लाभ मिला, इस संकट को और भी वास्तविक बना देता है। यह अब संदेह या आरोप का विषय नहीं रहा, बल्कि प्रमाणित सच्चाई बन चुका है। आज एक ओर वह छात्र है जो गरीबी से जूझते हुए तथा सीमित संसाधनों में भी ईमानदारी से संघर्ष कर रहा है और दूसरी ओर वह तंत्र है जहाँ कुछ लोग पैसों के बल पर उसी संघर्ष को खरीद लेते हैं। यदि सफलता का पैमाना मेहनत के बजाय आर्थिक क्षमता बन जाए तो यह केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि पूरे नैतिक तंत्र का पतन है। हर बार जब कोई परीक्षा रद्द होती है, तो केवल एक प्रक्रिया बाधित नहीं होती बल्कि लाखों छात्रों का आत्मविश्वास, उनकी मानसिक स्थिरता और उनके सपनों की समयसीमा टूट जाती है। यह वे युवा हैं जो अपने परिवार की उम्मीदों का भार उठाए हुए हैं, जो संघर्ष के रास्ते पर चलते हुए अपने जीवन को बदलना चाहते हैं। उनके लिए यह केवल परीक्षा नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। सबसे पीड़ादायक सच्चाई यह है कि..इसी टूटते हुए विश्वास, लगातार असफल होती व्यवस्था और असहनीय मानसिक दबाव के कारण कई छात्रों ने आत्महत्या जैसे कदम भी उठाए हैं। जब एक छात्र युवा जो अपने परिवार की उम्मीदों का केंद्र होता है, इस हद तक निराश हो जाता है कि उसे जीवन ही बोझ लगने लगता है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रहती..यह पूरे तंत्र की विफलता का प्रमाण बन जाती है। अब यह मुद्दा केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा। यह देश के भविष्य, उसकी संस्थाओं की विश्वसनीयता और उसके न्याय के आधार से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। यदि चयन की प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए, तो योग्यता का मूल्य स्वयं ही समाप्त हो जाता है। ऐसे में अब केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता है स्पष्ट जवाबदेही की, कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई की और ऐसी व्यवस्था की जो इस प्रकार के अपराधों को जड़ से समाप्त कर सके। शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं है, यह विश्वास की वह नींव है जिस पर एक राष्ट्र खड़ा होता है और यदि यही नींव बार-बार इस तरह दरकती रही तो आने वाला समय केवल बेरोजगारी या असमानता का संकट नहीं होगा बल्कि वह एक ऐसी पीढ़ी का समय होगा जो देश की व्यवस्था से ही भरोसा खो चुकी होगी। जिस दिन मेहनत करने वाला युवा ही व्यवस्था से उम्मीद छोड़ देगा, उस दिन हार किसी एक परीक्षा की नहीं, पूरे देश के भविष्य की होगी।

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