दवरा की मिट्टी के पहलवान करण सिंह यादव ने 1960 में दिनारा दंगल की रखी नींव, कुश्ती की परंपरा को बनाया पहचान

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गौ सेवा समिति ने वरिष्ठ पहलवान का किया सम्मान, युवाओं को खेल और स्वस्थ जीवन का दिया संदेश


दिनारा। दवरा की धरती पर जन्मे वरिष्ठ पहलवान करण सिंह यादव ने अपनी मेहनत, अनुशासन और कुश्ती के प्रति समर्पण से न केवल अखाड़े में अपनी पहचान बनाई, बल्कि दिनारा की दंगल परंपरा को भी मजबूत आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके इसी योगदान और खेल के प्रति समर्पण को देखते हुए गौ सेवा समिति द्वारा उनका सम्मान किया गया। सम्मान के दौरान उनके लंबे संघर्ष, पहलवानी के प्रति जुनून और युवाओं को खेलों से जोड़ने के प्रयासों को याद किया गया।


गौ सेवा समिति के अध्यक्ष एवं गौ सेवक कल्लू महाराज ने बताया कि करण सिंह यादव को बचपन से ही पहलवानी का शौक था। उन्होंने महज 11 वर्ष की उम्र से कुश्ती का अभ्यास शुरू कर दिया था। अखाड़े में निरंतर अभ्यास, कठिन मेहनत और अनुशासन के बल पर उन्होंने क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित पहलवान के रूप में पहचान बनाई। स्वयं कुश्ती लड़ने के साथ-साथ उन्होंने नई पीढ़ी के युवाओं को भी दांव-पेंच और अखाड़े की परंपराओं से परिचित कराया।


1960 में हुआ दिनारा दंगल का पहला आयोजन


कल्लू महाराज के अनुसार, वर्ष 1960 में दिनारा मेले में पहली बार दंगल का आयोजन किया गया था। इस शुरुआती आयोजन को आगे बढ़ाने में करण सिंह यादव और उनके साथियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उस समय संसाधन सीमित थे, लेकिन पहलवानों और ग्रामीणों में कुश्ती के प्रति जबरदस्त उत्साह था। धीरे-धीरे यह छोटा आयोजन लोगों के आकर्षण का केंद्र बनने लगा।


करण सिंह यादव स्वयं पहलवानों को कुश्ती के दांव-पेंच सिखाते और दंगल के लिए तैयार करते थे। उस दौर में विजेता पहलवानों का पारंपरिक तरीके से सम्मान किया जाता था। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले पहलवानों को लंगोट सहित अन्य पारंपरिक पुरस्कार दिए जाने की परंपरा भी रही।


बिना माइक के गूंजती थी पहलवान करण सिंह की आवाज


दंगल आयोजन में करण सिंह यादव की भूमिका केवल पहलवान के रूप में ही नहीं रही, बल्कि आयोजन व्यवस्था में भी उनका योगदान रहा। बताया जाता है कि उनकी आवाज इतनी बुलंद और प्रभावशाली थी कि लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उन्हें माइक की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। दंगल के दौरान उनकी आवाज दर्शकों और पहलवानों में जोश भर देती थी।


कई राज्यों के पहलवानों को आकर्षित करने लगा दिनारा दंगल


समय के साथ दिनारा का दंगल लगातार प्रसिद्ध होता गया। स्थानीय स्तर से शुरू हुई यह कुश्ती परंपरा आगे चलकर बड़े आयोजन का रूप लेने लगी। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, झांसी, शिवपुरी, चंडीगढ़, महाराष्ट्र सहित विभिन्न क्षेत्रों से पहलवान दिनारा के दंगल में पहुंचने लगे। नेपाल से भी पहलवानों के आने का उल्लेख किया जाता है। इससे दिनारा की पहचान कुश्ती और अखाड़ा संस्कृति के प्रमुख केंद्र के रूप में मजबूत हुई।


युवाओं को स्वस्थ जीवन का संदेश


कल्लू महाराज ने युवाओं से कहा कि जीवन में मजबूत बनना जरूरी है। अच्छा भोजन, अच्छी सोच, शिक्षा और खेलों से जुड़ाव व्यक्ति के व्यक्तित्व को मजबूत बनाता है। उन्होंने युवाओं से नशे और गलत संगत से दूर रहकर खेल एवं शिक्षा को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।


दवरा की मिट्टी ने दिया समाज को गौरव


कल्लू महाराज ने कहा कि दवरा गांव आकार में भले ही छोटा हो, लेकिन इसकी पहचान बड़ी है। गांव के अनेक लोगों ने फौज, पुलिस, शिक्षा, चिकित्सा, कानून और विभिन्न सरकारी विभागों में सेवाएं देकर क्षेत्र का नाम रोशन किया है। इसी गौरवशाली धरती ने पहलवान करण सिंह यादव जैसे व्यक्तित्व को जन्म दिया।


करण सिंह यादव का सम्मान केवल एक वरिष्ठ पहलवान का सम्मान नहीं, बल्कि उस अखाड़ा संस्कृति, मेहनत, अनुशासन और खेल परंपरा का सम्मान है, जिसने वर्षों से युवाओं को मजबूत और स्वस्थ बनने की प्रेरणा दी है। 1960 में शुरू हुई दिनारा की दंगल परंपरा आज जिस पहचान तक पहुंची है, उसमें ऐसे समर्पित पहलवानों के योगदान को सदैव याद किया जाएगा।

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