मध्यप्रदेश शासन की विभिन्न छात्रावास योजनाओं में विद्यार्थियों को आवास, भोजन, बिजली-पानी, फर्नीचर, बिस्तर, पुस्तकालय और अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रावधान है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई देता है? यदि व्यवस्था पर्याप्त है तो विद्यार्थी मूलभूत सुविधाओं के लिए कलेक्ट्रेट क्यों पहुँच रहे हैं? यदि निरीक्षण नियमित हैं तो जर्जर भवन, भोजन की समस्या, स्वच्छ पेयजल जल की कमी और अन्य अव्यवस्थाएँ समय रहते क्यों नहीं सुधारी जातीं? यदि बजट उपलब्ध है तो उसका प्रभाव छात्रावासों की वास्तविक जमीनी स्थिति में दिखाई क्यों नहीं देता? यह स्थिति केवल किसी एक अधिकारी या किसी एक छात्रावास की समस्या मानकर टाल देना उचित नहीं होगा। यह पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का प्रश्न है। सरकार को प्रदेश के सभी अनुसूचित जाति एवं जनजाति छात्रावासों की वास्तविक स्थिति का व्यापक भौतिक एवं सामाजिक ऑडिट कराना चाहिए। प्रत्येक छात्रावास की भवन स्थिति, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, भोजन, शौचालय, सुरक्षा, फर्नीचर, अध्ययन सुविधा, कर्मचारियों की उपलब्धता और बजट के उपयोग की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। विशेष रूप से कन्या छात्रावासों में छात्राओं से भोजन बनाने अथवा अन्य श्रम कराने संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आवश्यक है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्रावासों की शिकायतों के लिए केवल कागजी व्यवस्था न हो, बल्कि ऐसी प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली हो जहाँ विद्यार्थी बिना किसी भय या दबाव के अपनी समस्या दर्ज करा सकें और निश्चित समय सीमा में उसका समाधान हो। शिकायत करने वाले विद्यार्थी को ही समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराने या उसकी आवाज दबाने के बजाय शिकायत को व्यवस्था सुधारने का अवसर माना जाना चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक और संवेदनशील शासन की वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग के साथ कैसा व्यवहार करता है।अनुसूचित जाति,जनजाति तथा पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थी किसी कृपा या दया के पात्र नहीं बल्कि वे भी इसी समाज और इसी संविधान के नागरिक हैं और उन्हें सम्मानजनक जीवन, सुरक्षित वातावरण तथा शिक्षा के समान अवसर प्राप्त करने का पूरा अधिकार है।
जिस विद्यार्थी को किताब लेकर कक्षा में होना चाहिए, यदि वह अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए कलेक्ट्रेट के बाहर घंटों धूप में बैठा है, तो यह केवल उस विद्यार्थी की परेशानी नहीं है। यह हमारी शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न है। जिस छात्रा के हाथ में कलम और किताब होनी चाहिए, यदि वह व्यवस्था की कमी के कारण रोटियां बनाने के लिए मजबूर है, तो यह केवल एक छात्रावास की कहानी नहीं, बल्कि उन व्यवस्थागत कमियों का आईना है जिन्हें अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। विद्यार्थियों की आवाज को बार-बार आवेदन लेकर आने वाली भीड़ समझने के बजाय उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनना होगा। उन्हें आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए, निरीक्षण की औपचारिकता नहीं, व्यवस्था में वास्तविक बदलाव चाहिए। जर्जर छात्रावासों की मरम्मत और पुनर्निर्माण, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पेयजल, बिजली, स्वच्छता, सुरक्षित वातावरण और अध्ययन की सुविधाएँ सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्रावासों को ऐसा विकसित किया जाए जहाँ विद्यार्थी अपने भविष्य के सपने देख सकें और उन्हें पूरा करने के लिए एकाग्रता से पढ़ सकें। उन्हें अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने, अधिकारियों के चक्कर लगाने और व्यवस्था की कमियों का बोझ अपने कंधों पर उठाने के लिए मजबूर न होना पड़े। कब तक विद्यार्थी किताबों की जगह शिकायतों का बोझ उठाते रहेंगे? मध्यप्रदेश के छात्रावास मजबूरी का ठिकाना नहीं..विद्यार्थियों के सपनों की सुरक्षित नींव बनें। क्योंकि किताबों की उम्र में जब विद्यार्थी शिकायतों का बोझ उठाने लगे, तो सवाल केवल व्यवस्था का नहीं..सामाजिक न्याय की संवेदनशीलता का है।


