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प्रियदर्शन का कॉलम:नाम बदलने की मुहिम में कहीं काम अधूरा न रह जाए Breaking News Update
नाम बदलने की राजनीति दुनिया भर में आम है।
मुल्कों, शहरों, सड़कों, इमारतों के नाम बदले जाते हैं।
भारत में भी यह प्रक्रिया उत्साह से चलाई गई।
एक दौर में जो नाम बदले गए, उनका तर्क स्थानीय परम्परा और पहचान को लौटा लाने का था।
इस तर्क से बॉम्बे को मुम्बई किया गया, मद्रास को चेन्नई और कलकत्ता को कोलकाता।
ब्रिटिश शासन के समय अंग्रेज शासकों के नाम पर रखे गए नाम भी बदले गए।
कर्जन रोड कस्तूरबा गांधी मार्ग हो गया और कनॉट प्लेस राजीव गांधी चौक।
हालांकि मुंह पर चढ़े पुराने नाम आसानी से पीछा नहीं छोड़ते।
कनॉट प्लेस भी बना हुआ है।
वैसे बीते दिनों नाम बदलने की जो मुहिम चली है, उसका वास्ता मजहबी पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति के आग्रह से दिखता है।
खासकर मुस्लिम पहचानों की स्टीरियोटाइपिंग की भी कोशिश दिख रही है।
दिल्ली में सबसे लंबे समय तक राज करने वाले बादशाह औरंगजेब के नाम पर चलती आ रही सड़क का नाम एपीजे अब्दुल कलाम मार्ग कर दिया गया- यह कहते हुए कि हमें औरंगजेब जैसे नहीं, कलाम जैसे मुसलमान चाहिए।
इलाहाबाद को फिर भी प्रयागराज के रूप में कभी जाना जाता था, लेकिन बहुत लोकप्रिय नामों को बहुत अनजान और संस्कृतनिष्ठ नामों से बेदखल किया जा रहा है।
इस वजह से हमारे शहर हमारे ही स्मृति-कोश से बाहर होते जा रहे हैं।
नाम बदलने की मुहिम में एक नया उत्साह दिख रहा है।
पहले कहा गया कि मनरेगा यानी महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना का नाम पूज्य बापू रोजगार गारंटी योजना किया जाएगा।
लेकिन फिर खबर आई कि इसकी जगह एक नया नाम चुना गया है- विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)।
हिंदी-अंग्रेजी मिले ऐसे अजीब-से नाम की क्या जरूरत थी? क्योंकि इसका संक्षिप्त रूप वीबी-जी राम जी बनता है।
क्या यह महात्मा गांधी को पहले पूज्य बापू और फिर राम जी से विस्थापित करने की कोशिश है? इसके पीछे छुपी मंशा समझना मुश्किल नहीं है।
लेकिन नाम बदलने की इस राजनीति में मूल मुद्दे और असुविधाजनक सवाल पीछे रह गए हैं।
इस नए कानून में रोजगार गारंटी सौ दिन की नहीं, सवा सौ दिन की होगी।
इससे संदेश जाता है कि सरकार ने मजदूरों का, दिहाड़ी पर काम करने वाले लोगों का बहुत खयाल रखा।
लेकिन हकीकत क्या है? शनिवार के ‘दैनिक भास्कर’ में ही छपी खबर के मुताबिक केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री कमलेश पासवान ने राज्यसभा में जानकारी दी कि मनरेगा के तहत बीते पांच वर्षों में प्रतिवर्ष औसतन 50.24 दिन का रोजगार मिला है।
यानी फिलहाल 100 दिन की गारंटी भी पूरी नहीं की जा रही है, फिर इसे 125 दिन कर देने के दिखावे का क्या मतलब है? सरकार रोजगार दे नहीं पा रही या लोग लेने नहीं आ रहे? दोनों ही सूरतों में 125 दिन की गारंटी का दिखावा तार-तार हो जाता है।
समस्या बस इतनी नहीं है।
सरकार का कहना है कि इस योजना पर अमल राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, केंद्र का काम बस इसकी समीक्षा करना है।
लेकिन राज्यसभा में सरकार यह जानकारी भी दे रही है कि इस 5 दिसंबर तक मनरेगा के मद के 9746 करोड़ से ज्यादा की रकम बकाया है।
यह 2025-26 के मनरेगा के बजट का करीब 27 फीसदी है।
तो सच्चाई यह है कि बीते करीब दो दशकों में जिस योजना ने इस देश के गरीब मजदूरों का पलायन कुछ घटाया, उद्योग-धंधों में चलने वाला उनका शोषण कुछ कम किया, उसे ठीक से लागू तक नहीं किया जा रहा है।
नाम महात्मा गांधी रखिए, पूज्य बापू या जय राम जी- योजना अमल में आएगी तो लोगों का भला होगा, वरना आखिरी आदमी तक पहुंचने का जो जंतर गांधी ने दिया था, वही नाकाम हो जाएगा और रामराज्य भी अधूरा रह जाएगा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)।
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Posted on 17 December 2025 | Visit सत्यालेख.com for more stories.
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