जब तक सीवर में इंसान उतरेगा, विकास अधूरा रहेगा: मृत्यु का मुआवज़ा या जीवन का अधिकार?

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 एक बार फिर मध्यप्रदेश में दो सफाई कर्मचारी टैंक और पाइपों की अंधेरी गहराई में उतरकर लौटकर नहीं आए। यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी..यह हमारी सामूहिक संवेदनहीनता का प्रमाण है। हर बार वही क्रम दोहराया जाता है-मौत, शोक, मुआवज़ा, और फिर मौन। हर बार जब कोई सफाई कर्मचारी सीवर या सेप्टिक टैंक की जहरीली, अंधेरी गहराइयों में उतरता है, वह केवल अपना काम नहीं कर रहा होता बल्कि वह अपने जीवन को दांव पर लगा रहा होता है और जब वह लौटकर नहीं आता और शासन-प्रशासन एवं नगर निगमों की लापरवाहीयों की भेंट चढ़ जाता है। क्या यही हमारे समय की संवेदना है? क्या 20 या 30 लाख रुपये किसी जीवन का मूल्य तय कर सकते हैं? या हमने यह मान लिया है कि कुछ जिंदगियाँ जोखिम के साथ ही आती हैं और उनकी मृत्यु प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है? बीते वर्षों के आधिकारिक आँकड़े इस संवेदनहीनता की कठोर सच्चाई सामने रखते हैं। संसद में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार वर्ष 2019 से 2023 के बीच कम से कम 377 से अधिक सफाई कर्मियों की मौतें सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दर्ज की गईं। वर्ष 2018 से 2024 तक यह संख्या 400 से अधिक बताई गई है। ये केवल वे मौतें हैं जो रिकॉर्ड में दर्ज हैं; सामाजिक संगठनों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामलों को सामान्य दुर्घटना बताकर अलग श्रेणी में डाल दिया जाता है। हर संख्या के पीछे एक परिवार है, एक माँ की सूनी गोद है, एक पत्नी की टूटी दुनिया है, एक बच्चे का छिन गया सहारा है। कानून मौजूद है। 2013 का अधिनियम असुरक्षित सीवर और सेप्टिक टैंक में मानव प्रवेश को अपराध घोषित करता है और स्पष्ट करता है कि बिना सुरक्षा उपकरण, गैस डिटेक्टर, पीपीई किट और प्रशिक्षित टीम के किसी को उतारना दंडनीय है। सुप्रीम कोर्ट भी यह स्पष्ट कर चुका है कि ऐसे मामलों में मुआवज़ा राज्य की जिम्मेदारी है, पर न्यायालय का मूल उद्देश्य मौत के बाद भुगतान नहीं, मौत को रोकना था। फिर भी वास्तविकता यह है कि मशीनें होने के बावजूद उनका नियमित उपयोग नहीं होता, ठेकेदारी व्यवस्था में जवाबदेही धुंधली है और 'मुआवज़ा दे दिया जाएगा' जैसी मानसिकता एक खतरनाक सामान्यता बन चुकी है। प्रश्न यह नहीं कि मुआवज़ा दिया जाए या नहीं बल्कि प्रश्न यह है कि वही धन पहले सुरक्षा पर क्यों नहीं लगाया जाता? यदि एक राज्य अथवा नगर निगम एक मृत्यु के बाद 20-30 लाख रुपये दे सकता है, तो क्या वही राशि पहले आधुनिक सीवर जेटिंग मशीन, रोबोटिक क्लीनिंग सिस्टम, गैस डिटेक्टर, एससीबीए सेट और प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम पर निवेश नहीं की जा सकता? एक मृत्यु के बाद दिया गया पैसा कई संभावित मौतों को रोक सकता है..यदि उसे पहले लगाया जाए। पर हमने रोकथाम की जगह प्रतिपूर्ति को आसान विकल्प बना लिया है। हम विकास, स्मार्ट सिटी और आधुनिक भारत की बात करते हैं, पर उन्हीं शहरों की सफाई करने वाले हाथ आज भी जहरीली गैसों में दम तोड़ते हैं। यह केवल प्रशासन की विफलता नहीं, यह हमारी सामूहिक चेतना की परीक्षा है। हम आक्रोश व्यक्त करते हैं, सोशल मीडिया पर शोक लिखते हैं, पर संगठित संकल्प नहीं लेते। हमें तय करना होगा कि क्या हम अपने ही समाज के सफाईकर्मियों श्रमिकों के जीवन को मुआवज़े की रकम में तौलते रहेंगे या यह मांग करेंगे कि अब कोई भी सफाई कर्मचारी मौत के अंधे कुएँ में न उतरे। न्याय का अर्थ केवल आर्थिक सहायता नहीं है; न्याय का अर्थ है बाध्यकारी, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था जो भविष्य में किसी भी श्रमिक को असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर न होने दे। संवेदना शब्दों से नहीं, संरचनात्मक परिवर्तन से सिद्ध होती है। यदि हम सच में एक संवेदनशील और विकसित भारत का स्वप्न देखते हैं, तो पहला कदम यही होना चाहिए कि हर सीवर में उतरने से पहले मशीन उतरे, हर टैंक की सफाई से पहले सुरक्षा जांच हो, हर श्रमिक को उपकरण और प्रशिक्षण मिले और हर अधिकारी को जवाबदेही का भय हो। मुआवज़ा आवश्यक है, पर वह समाधान नहीं है। समाधान है...मृत्यु से पहले व्यवस्था। संवेदना तभी सच्ची होगी जब हम मृत्यु के बाद आँसू नहीं, मृत्यु से पहले व्यवस्थाओ को दुरुस्त कर परिवर्तन का साहस दिखाएँगे। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिन हाथों से हम अपने शहरों को स्वच्छ रखते हैं, उन्हीं हाथों को हम सबसे असुरक्षित परिस्थितियों में धकेल देते हैं? यदि हम सच में बदलता हुआ भारत चाहते हैं, तो पहला संकल्प यही होना चाहिए कि कोई भी सफाई कर्मचारी अब अंधेरे कुएँ में अपनी जान जोखिम में डालकर न उतरे। हमें मुआवज़े की घोषणा से आगे बढ़कर जवाबदेही की मांग करनी होगी, तकनीक और सुरक्षा में निवेश को अनिवार्य बनाना होगा। अब निर्णय हमें करना है..हम मुआवज़ों से संतोष करेंगे या जीवन की सुरक्षा को अनिवार्य बनाएँगे, क्योंकि जिस विकास की नींव किसी श्रमिक की मृत्यु पर टिके, वह विकास नहीं, व्यवस्था की विफलता है।

✍️"कु.प्रियंका जाटव" 

 [लेखिका: सामाजिक कार्यकर्ता विचारक-चिंतक]

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