राष्ट्रीय राजमार्ग पर 12 फुट गहरा गड्ढा बना ‘मौत का कुआं’, नगरवासियों की चेतावनी—तुरंत करें सुरक्षा इंतजाम

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 शिवपुरी जिले के दिनारा क्षेत्र में अशोक होटल के पास पिछोर तिराहे पर राष्ट्रीय राजमार्ग के डिवाइडर के बीच करीब 12 फुट गहरा गड्ढा खोदा गया है, जो अब लोगों के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। यह गड्ढा बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था, बैरिकेडिंग या चेतावनी संकेत के खुला पड़ा हुआ है, जिससे यहां से गुजरने वाले राहगीरों, वाहन चालकों और पशुओं के लिए हर पल जान का जोखिम बना हुआ है।


स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों का कहना है कि यह गड्ढा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा सीसीटीवी कैमरा लगाने के उद्देश्य से खोदा गया है। हालांकि कैमरा लगाना सुरक्षा की दृष्टि से सराहनीय कदम है, लेकिन गड्ढे को इस तरह असुरक्षित छोड़ देना घोर लापरवाही को दर्शाता है। दिन-रात इस मार्ग से भारी वाहनों की आवाजाही रहती है, ऐसे में एक छोटी सी चूक भी बड़े हादसे में बदल सकती है।


गौ सेवक कल्लू महाराज ने प्रशासन को चेताते हुए कहा कि यह गड्ढा इंसानों के साथ-साथ गौवंश और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “हम विकास कार्यों के विरोध में नहीं हैं, लेकिन सुरक्षा को नजरअंदाज करना बेहद खतरनाक है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो किसी भी दिन बड़ी जनहानि या पशुहानि हो सकती है।”


नगरवासियों ने सामूहिक रूप से प्रशासन से अपील करते हुए मांग की है कि इस गड्ढे के चारों ओर तत्काल मजबूत बैरिकेडिंग की जाए, चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं और रात के समय उचित प्रकाश व्यवस्था की जाए। साथ ही, कार्य को जल्द से जल्द पूर्ण कर गड्ढे को सुरक्षित रूप से बंद किया जाए।


इस संबंध में नगर के कई जिम्मेदार नागरिकों—अजय लोधी, विजेंद्र लोधी, जितेंद्र लोधी, जितेंद्र योगी, दिनेश झा, बल्लू खोड़, आशीष गेंडा, भूरा लोधी, मैथिली शरण गुप्ता और गोलू लोधी—ने भी प्रशासन से गंभीरता से कार्रवाई करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो यह गड्ढा किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है, जिसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की होगी।


नगरवासियों ने प्रशासन से आग्रह किया है कि जनहित और जीव-जंतुओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इस समस्या का तत्काल समाधान किया जाए, ताकि किसी भी निर्दोष की जान जोखिम में न पड़े। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं और कब तक इस ‘मौत के कुएं’ को सुरक्षित बनाते हैं।

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