प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, सुबह से ही पुलिस और प्रशासनिक अमला मौके पर पहुंच गया था। देखते ही देखते जेसीबी मशीनें चलने लगीं और वर्षों पुराने बताए जा रहे चबूतरे को मलबे में तब्दील कर दिया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल एक चबूतरा नहीं बल्कि उनकी आस्था का केंद्र था, जहां वर्षों से पूजा-पाठ होता आ रहा था। रहवासियों का आरोप है कि प्रशासन ने बिना पर्याप्त सूचना और जनसहमति के सीधे कार्रवाई कर दी।
“2008 से था मंदिर, प्रशासन झूठ बोल रहा”
स्थानीय लोगों ने प्रशासन के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया कि चबूतरा महज चार महीने पहले कब्जे की नीयत से बनाया गया था। रहवासियों का कहना है कि यहां वर्ष 2008 से भगवान शंकर की स्थापना थी और नियमित रूप से पूजा होती थी। लोगों ने सवाल उठाया कि यदि निर्माण अवैध था तो प्रशासन इतने वर्षों तक मौन क्यों रहा।
एक स्थानीय निवासी ने नाराजगी जताते हुए कहा,
“अगर जमीन सरकारी थी तो प्रशासन पहले नोटिस देता, बातचीत करता, लेकिन सीधे भगवान का स्थान तोड़ देना अमानवीय और दुर्भाग्यपूर्ण है।”
भारी पुलिस बल के बीच चली कार्रवाई
कार्रवाई के दौरान प्रशासन और रहवासियों के बीच तीखी बहस भी हुई। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा, जिससे आम लोगों में भय और असंतोष का माहौल दिखाई दिया। महिलाओं और बुजुर्गों ने भी विरोध दर्ज कराया, लेकिन प्रशासनिक अमले ने किसी की नहीं सुनी और पूरा क्षेत्र खाली करा दिया।
धार्मिक भावनाओं की अनदेखी के आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन ने विकास कार्यों के नाम पर धार्मिक आस्थाओं को कुचलने का काम किया है। लोगों का कहना है कि यदि जनपद भवन बनाना ही था तो चबूतरे को दूसरी जगह सम्मानपूर्वक स्थापित किया जा सकता था। लेकिन प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय कठोर रवैया अपनाया।
प्रशासन का पक्ष
प्रशासन का कहना है कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा हटाने की कार्रवाई नियमानुसार की गई है। अधिकारियों के मुताबिक, संबंधित स्थल पर हाल ही में अतिक्रमण कर धार्मिक स्वरूप देने की कोशिश की गई थी ताकि कार्रवाई रोकी जा सके। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि सरकारी परियोजना में किसी भी प्रकार का अवरोध स्वीकार नहीं किया जाएगा।
फिलहाल इस कार्रवाई के बाद इलाके में नाराजगी का माहौल है और स्थानीय लोग प्रशासन के रवैये पर सवाल उठा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक तूल पकड़ सकता है।



