सबसे हैरानी की बात यह है कि यह पूरा अवैध कारोबार बिना किसी डर के, प्रशासन की नाक के नीचे धड़ल्ले से संचालित हो रहा है। जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी और निष्क्रियता अब बड़े सवाल खड़े कर रही है—क्या यह सब उनकी अनदेखी है या फिर किसी दबाव का परिणाम?
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि रेत माफिया बाहुबली तत्वों और सत्ता के संरक्षण में पूरी तरह बेखौफ हो चुके हैं। नियम-कानूनों को ताक पर रखकर दिनदहाड़े अवैध खनन किया जा रहा है, लेकिन शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं होती। ग्रामीणों का कहना है कि अगर कोई आवाज उठाता है तो उसे दबाने की कोशिश भी की जाती है।
यह अवैध खनन न सिर्फ पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है, बल्कि सिंध नदी के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार हो रही मशीनों से खुदाई के कारण नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, जलस्तर तेजी से गिर रहा है और आसपास के क्षेत्रों में जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
इसके साथ ही शासन को हर दिन लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जो सीधे तौर पर सरकारी खजाने पर चोट है। बावजूद इसके, जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठे हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब जागेगा प्रशासन? क्या अवैध खनन माफियाओं पर लगाम लगेगी या फिर इसी तरह कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए यह काला कारोबार चलता रहेगा?


